A A A A A

अतिरिक्त: [बहुविवाह]


1 कोरिन्‍थी 7:1-5
[1] आब ओहि बात सभक विषय मे जे अहाँ सभ पत्र मे लिखि कऽ पुछने छी—हँ, पुरुषक लेल स्‍त्री केँ नहि छुबी से नीक बात अछि।[2] मुदा एतेक अनैतिक सम्‍बन्‍ध चलि रहल अछि जे ताहि सँ बचबाक लेल प्रत्‍येक पुरुष केँ अपन स्‍त्री होअय आ प्रत्‍येक स्‍त्री केँ अपन पति।[3] पति अपना स्‍त्रीक प्रति अपन वैवाहिक कर्तव्‍य पूरा करय, आ तहिना स्‍त्री सेहो अपना पतिक प्रति।[4] स्‍त्री केँ अपना शरीर पर अधिकार नहि छैक; ओहि पर ओकर पतिक अधिकार छैक। आ तहिना पति केँ ओकर अपना शरीर पर अधिकार नहि छैक; ओहि पर ओकर स्‍त्रीक अधिकार छैक।[5] अहाँ सभ एक-दोसर केँ एहि अधिकार सँ वंचित नहि करू। जँ अपना केँ प्रार्थना मे समर्पित करबाक लेल से करबो करी तँ दूनूक सहमत सँ आ किछुए समयक लेल। तखन फेर पहिने जकाँ एक संग रहू जाहि सँ एना नहि होअय जे अहाँ सभ केँ अपना पर काबू नहि राखि सकबाक कारणेँ अहाँ सभ केँ शैतान प्रलोभन मे फँसाबय।

Maithili Bible 2010
©2010 The Bible Society of India and WBT