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रहस्य: [ड्रेगन]


यहेजकेल २९:३
कहो, “मेरा स्वामी यहोवा यह कहता है: मिस्र के राजा फिरौन, मैं तुम्हारे विरुद्ध हूँ। तुम नील नदी के किनारे विश्राम करते हुए विशाल दैत्य हो। तुम कहते थे, “यह मेरी नदी है! मैंने यह नदी बनाई है!”

यहेजकेल ३२:२
“मनुष्य के पुत्र, मिस्र के राजा के विषय में यह करुणगीत गाओ। उससे कहो: ‘तुमने सोचा था तुम शक्तिशाली युवा सिंह हो, राष्ट्रों में गर्व सहित टहलते हुए। किन्तु सचमुच समुद्र के दैत्य जैसे हो। तुम प्रवाह को धकेल कर रास्ता बनाते हो, और अपने पैरों से जल को मटमैला करते हो। तुम मिस्र की नदियों को उद्वेलित करते हो।”

यशायाह २७:१
उस समय, यहोवा लिब्यातान का न्याय करेगा जो एक दुष्ट सर्प है। हे यहोवा अपनी बड़ी तलवार, अपनी सुदृढ़ और शक्तिशाली तलवार, कुंडली मारे सर्प लिब्यातान को मारने में उपयोग करेगा। यहोवा सागर के विशालकाय जीव को मार डालेगा।

यशायाह ५१:९
यहोवा की भुजा (शक्ति) जाग-जाग। अपनी शक्ति को सज्जित कर! तू अपनी शक्ति का प्रयोग कर। तू वैसे जाग जा जैसे तू बहुत बहुत पहले जागा था। तू वही शक्ति है जिसने रहाब के छक्के छुड़ाये थे। तूने भयानक मगरमच्छ को हराया था।

अय्यूब ७:१२
हे परमेश्वर, तू मेरी रखवाली क्यों करता है क्या मैं समुद्र हूँ, अथवा समुद्र का कोई दैत्य

अय्यूब ४१:१८-२१
[१८] लिब्यातान जब छींका करता है तो ऐसा लगता है जैसे बिजली सी कौंध गई हो। आँखे उसकी ऐसी चमकती है जैसे कोई तीव्र प्रकाश हो।[१९] उसके मुख से जलती हुई मशालें निकलती है और उससे आग की चिंगारियाँ बिखरती हैं।[२०] लिब्यातान के नथुनों से धुआँ ऐसा निकलता है, जैसे उबलती हुई हाँडी से भाप निकलता हो।[२१] लिब्यातान की फूँक से कोपले सुलग उठते हैं और उसके मुख से डर कर दूर भाग जाया करते हैं।

भजन संहिता १८:८
परमेश्वर के नथनों से धुँआ निकल पड़ा। परमेश्वर के मुख से ज्वालायें फूट निकली, और उससे चिंगारियाँ छिटकी।

भजन संहिता ४४:१९
किन्तु, हे यहोवा, तूने हमें इस स्थान पर ऐसे ठूँस दिया है जहाँ गीदड़ रहते हैं। तूने हमें इस स्थान में जो मृत्थु की तरह अंधेरा है मूँद दिया है।

भजन संहिता ७४:१३
हे परमेश्वर, तूने अपनी महाशक्ति से लाल सागर के दो भाग कर दिये।

प्रकाशित वाक्य १:७
देखो, मेघों के साथ मसीह आ रहा है। हर एक आँख उसका दर्शन करेगी। उनमें वे भी होंगे, जिन्होंने उसे बेधा था। तथा धरती के सभी लोग उसके कारण विलाप करेंगे। हाँ! हाँ निश्चयपूर्वक ऐसा ही हो-आमीन!

प्रकाशित वाक्य ११:७
उनके सक्षी दे चुकने के बाद, वह पशु उस महागर्त से बाहर निकलेगा और उन पर आक्रमण करेगा। वह उन्हें हरा देगा और मार डालेगा।

व्यवस्था विवरण ३२:३३
उनकी दाखमधु साँपों के विष जैसी है और क्रूर कालकूट अस्प नाम का।

प्रकाशित वाक्य १३:८
धरती के वे सभी निवासी उस पशु की उपासना करेंगे जिनके नाम उस मेमने की जीवन-पुस्तक में संसार के आरम्भ से ही नहीं लिखे जिसका बलिदान किया जाना सुनिश्चित है।

प्रकाशित वाक्य १६:१३
फिर मैंने देखा कि उस विशालकाय अजगर के मुख से, उस पशु के मुख से और कपटी नबियों के मुख से तीन दुष्टात्माएँ निकलीं, जो मेंढक के समान दिख रहीं थी।

निर्गमन ७:१०-१२
[१०] इसलिए मूसा और हारून फ़िरौन के पास गए और यहोवा की आज्ञा का पालन किया। हारून ने अपनी लाठी नीचे फेंकी। फिरौन और उसके अधिकारियों के देखते-देखते लाठी साँप बन गयी।[११] इसलिए फ़िरौन ने अपने गुणी पुरुषों और जादूगरों को बुलाया। इन लोगों ने अपने रहस्य चातुर्य का उपयोग किया और वे भी हारून के समान कर सके।[१२] उन्होंने अपनी लाठियाँ ज़मीन पर फेंकी और वे साँप बन गई। किन्तु हारून की लाठी ने उनकी लाठियों को खा डाला।

अय्यूब ४०:१५-२०
[१५] अय्यूब, देख तू, उस जलगज को मैंने (परमेश्वर) ने बनाया है और मैंने ही तुझे बनाया है। जलगज उसी प्रकार घास खाती है, जैसे गाय घास खाती है।[१६] जलगज के शरीर में बहुत शक्ति होती है। उसके पेट की माँसपेशियाँ बहुत शक्तिशाली होती हैं।[१७] जल गज की पूँछ दृढ़ता से ऐसी रहती है जैसा देवदार का वृक्ष खड़ा रहता है। उसके पैर की माँसपेशियाँ बहुत सुदृढ़ होती हैं।[१८] जल गज की हड्‌डियाँ काँसे की भाँति सुदृढ़ होती है, और पाँव उसके लोहे की छड़ों जैसे।[१९] जल गज पहला पशु है जिसे मैंने (परमेश्वर) बनाया है किन्तु मैं उस को हरा सकता हूँ।[२०] जल गज जो भोजन करता है उसे उसको वे पहाड़ देते हैं जहाँ बनैले पशु विचरते हैं।

प्रकाशित वाक्य १२:१-१७
[१] इसके पश्चात् आकाश में एक बड़ा सा संकेत प्रकट हुआ: एक महिला दिखाई दी जिसने सूरज को धारण किया हुआ था और चन्द्रमा उसके पैरों तले था। उसके माथे पर मुकुट था जिसमें बारह तारे जड़े थे।[२] वह गर्भवती थी। और क्योंकि प्रसव होने ही वाला था इसलिए प्रजनन की पीड़ा से वह कराह रही थी।[३] स्वर्ग में एक और संकेत प्रकट हुआ। मेरे सामने ही एक लाल रंग का विशालकाय अजगर खड़ा था। उसके सातों सिरों पर सात मुकुट थे।[४] उसकी पूँछ ने आकाश के तारों के एक तिहाई भाग को सपाटा मारकर धरती पर नीचे फेंक दिया। वह स्त्री जो बच्चे को जन्म देने ही वाली थी, वह अजगर उसके सामने खड़ा हो गया ताकि वह जैसे ही उस बच्चे को जन्म दे, वह उसके बच्चे को निगल जाए।[५] फिर उस स्त्री ने एक बच्चेको जन्म दिया जो एक लड़का था। उसे सभी जातियों पर लौह दण्ड के साथ शासन करना था। किन्तु उस बच्चे को उठाकर परमेश्वर और उसके सिंहासन के सामने ले जाया गया।[६] और वह स्त्री निर्जन वन में भाग गई। एक ऐसा स्थान जो परमेश्वर ने उसी के लिए तैयार किया था ताकि वहाँ उसे एक हज़ार दो सौ साठ दिन तक जीवित रखा जा सके।[७] फिर स्वर्ग में एक युद्ध भड़क उठा। मीकाईल और उसके दूतों का उस विशालकाय अजगर से संग्राम हुआ। उस विशालकाय अजगर ने भी उसके दूतों के साथ लड़ाई लड़ी।[८] किन्तु वह उन पर भारी नहीं पड़ सका, सो स्वर्ग में उनका स्थान उनके हाथ से निकल गया।[९] और उस विशालकाय अजगर को नीचे धकेल दिया गया। यह वही पुराना महानाग है जिसे दानव अथवा शैतान कहा गया है। यह समूचे संसार को छलता रहता है। हाँ, इसे धरती पर धकेल दिया गया था।[१०] फिर मैंने ऊँचे स्वर में एक आकाशवाणी को कहते सुना: “यह हमारे परमेश्वर के विजय की घड़ी है। उसने अपनी शक्ति और संप्रभुता का बोध करा दिया है। उसके मसीह ने अपनी शक्ति को प्रकट कर दिया है क्योंकि हमारे बन्धुओं पर परमेश्वर के सामने दिन-रात लांछन लगाने वाले को नीचे धकेल दिया गया है।[११] उन्होंने मेमने के बलिदान के रक्त और उनके द्वारा दी गई साक्षी से उसे हरा दिया है। उन्होंने अपने प्राणों का परित्याग करने तक अपने जीवन की परवाह नहीं की।[१२] सो हे स्वर्गो और स्वर्गों के निवासियों आनन्द मनाओ। किन्तु हाय, धरती और सागर, तुम्हारे लिए कितना बुरा होगा क्योंकि शैतान अब तुम पर उतर आया है। वह क्रोध से आग-बबूला हो रहा है। क्योंकि वह जनता है कि अब उसका बहुत थोड़ा समय शेष है।”[१३] जब उस विशाल काय अजगर ने देखा कि उसे धरती पर नीचे धकेल दिया गया है तो उसने उस स्त्री का पीछा करना शुरू कर दिया जिसने पुत्र जना था।[१४] किन्तु उस स्त्री को एक बड़े उकाब के दो पंख दिए गए ताकि वह उस वन प्रदेश को उड़ जाए, जो उसके लिए तैयार किया गया था। साढ़े तीन साल तक वहीं उस विशालकाय अजगर से दूर उसका भरण-पोषण किया जाना था।[१५] तब उस महानाग ने उस स्त्री के पीछे अपने मुख से नदी के समान जल धारा प्रवाहित की ताकि वह उसमें बह कर डूब जाए।[१६] किन्तु धरती ने अपना मुख खोलकर उस स्त्री की सहायता की और उस विशालकाय अजगर ने अपने मुख से जो नदी निकाली थी, उसे निगल लिया।[१७] इसके बाद तो वह विशालकाय अजगर उस स्त्री पर बहुत क्रोधित हो उठा और उसके उन वंशजों के साथ जो परमेश्वर के आदेशों का पालन करते हैं और यीशु की साक्षी को धारण करते हैं, युद्ध करने को निकल पड़ा।

प्रकाशित वाक्य १३:१-१८
[१] फिर मैंने सागर में से एक पशु को बाहर आते देखा। उसके दस सींग थे और सात सिर थे। तथा अपने सीगों पर उसने दस राजसी मुकुट पहने हुए थे। उसके सिरों पर दुष्ट नाम अंकित थे।[२] मैंने जो पशु देखा था, वह चीते जैसा था। उसके पैर भालू के पैर जैसे थे और उसका मुख सिंह के मुख के समान था। उस विशालकाय अजगर ने अपनी शक्ति, अपना सिंहासन और अपना प्रचुर अधिकार उसे सौंप दिया।[३] मैंने देखा कि उसका एक सिर ऐसा दिखाई दे रहा था जैसे उस पर कोई घातक घाव लगा हो किन्तु उसका वह घातक घाव भर चुका था। समूचा संसार आश्चर्य चकित होकर उस पशु के पीछे हो लिया।[४] तथा वे उस विशालकाय अजगर को पूजने लगे। क्योंकि उसने अपना समूचा अधिकार उस पशु को दे दिया था। वे उस पशु की भी उपासना करते हुए कहने लगे, “इस पशु के समान कौन है? और ऐसा कौन है जो उससे लड़ सके?”[५] उसे अनुमति दे दी गई कि वह अहंकार पूर्ण तथा निन्दा से भरे शब्द बोलने में अपने मुख का प्रयोग करे। उसे बयालीस महीने तक अपनी शक्ति के प्रयोग का अधिकार दिया गया।[६] सो उसने परमेश्वर की निन्दा करना आरम्भ कर दिया। वह परमेश्वर के नाम और उसके मन्दिर तथा जो स्वर्ग में रहते हैं, उनकी निन्दा करने लगा।[७] परमेश्वर के संत जनों के साथ युद्ध करने और उन्हें हराने की अनुमति उसे दे दी गई। तथा हर वंश, हर जाति, हर परिवार-समूह हर भाषा और हर देश पर उसे अधिकार दिया गया।[८] धरती के वे सभी निवासी उस पशु की उपासना करेंगे जिनके नाम उस मेमने की जीवन-पुस्तक में संसार के आरम्भ से ही नहीं लिखे जिसका बलिदान किया जाना सुनिश्चित है।[९] यदि किसी के कान हैं तो वह सुने:[१०] बंदीगृह में बंदी होना, जिसकी नियति बनी है वह निश्चय ही बंदी होगा। यदि कोई असि से मरेगा तो वह भी उस ही असि से मारा जाएगा। इसी में तो परमेश्वर के संत जनों से धैर्यपूर्ण सहनशीलता और विश्वास की अपेक्षा है।[११] इसके पश्चात् मैंने धरती से निकलते हुए एक और पशु को देखा। उसके मेमने के सींगों जैसे दो सींग थे। किन्तु वह एक महानाग के समान बोलता था।[१२] उस विशालकाय अजगर के सामने वह पहले पशु के सभी अधिकारों का उपयोग करता था। उसने धरती और धरती पर सभी रहने वालों से उस पहले पशु की उपासना करवाई जिसका घातक घाव भर चुका था।[१३] दूसरे पशु ने बड़े-बड़े चमत्कार किए। यहाँ तक कि सभी लोगों के सामने उसने धरती पर आकाश से आग बरसवा दी।[१४] वह धरती के निवासियों को छलता चला गया क्योंकि उसके पास पहले पशु की उपस्थिति में चमत्कार दिखाने की शक्ति थी। दूसरे पशु ने धरती के निवासियों से उस पहले पशु को आदर देने के लिए जिस पर तलवार का घाव लगा था और जो ठीक हो गया था उसकी मूर्ति बनाने को कहा।[१५] दूसरे पशु को यह शक्ति दी गई थी कि वह पहले पशु की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा करे ताकि पहले पशु की वह मूर्ति न केवल बोल सके बल्कि उन सभी को मार डालने का आदेश भी दे सके जो इस मूर्ति की उपासना नहीं करते।[१६] [This verse may not be a part of this translation][१७] [This verse may not be a part of this translation][१८] जिसमें बुद्धि हो, वह उस पशु के अंक का हिसाब लगा ले क्योंकि वह अंक किसी व्यक्ति के नाम से सम्बन्धित है। उसका अंक है छः सौ छियासठ।

प्रकाशित वाक्य २०:१-१५
[१] फिर आकाश से मैंने एक स्वर्गदूत को नीचे उतरते देखा। उसके हाथ में पाताल की चाबी और एक बड़ी साँकल थी।[२] उसने उस पुराने महा सर्प को पकड़ लिया जो दैत्य यानी शैतान है फिर एक हजार वर्ष के लिए उसे साँकल से बाँध दिया।[३] तब उस स्वर्गदूत ने उसे महागर्त में धकेल कर ताला लगा दिया और उस पर कपाट लगा कर मुहर लगा दी ताकि जब तक हजार साल पूरे न हो जायें वह लोगों को धोखा न दे सके। हज़ार साल पूरे होने के बाद थोड़े समय के लिए उसे छोड़ा जाना है।[४] फिर मैंने कुछ सिंहासन देखे जिन पर कुछ लोग बैठे थे। उन्हें न्याय करने का अधिकार दिया गया था और मैंने उन लोगों की आत्माओं को देखा जिनके सिर, उस सत्य के कारण, जो यीशु द्वारा प्रमाणित है, और परमेश्वर के संदेश के कारण काटे गए थे, जिन्होंने उस पशु या उसकी प्रतिमा की कभी उपासना नहीं की थी। तथा जिन्होंने अपने माथों पर या अपने हाथों पर उसका संकेत चिन्ह धारण नहीं किया था। वे फिर से जीवित हो उठे और उन्होंने मसीह के साथ एक हजार वर्ष तक राज्य किया।[५] (शेष लोग हज़ार वर्ष पूरे होने तक फिर से जीवित नहीं हुए।) यह पहला पुनरुत्थान है।[६] वह धन्य है और पवित्र भी है जो पहले पुनरुत्थान में भाग ले रहा है। इन व्यक्तियों पर दूसरी मृत्यु को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। बल्कि वे तो परमेश्वर और मसीह के अपने याजक होंगे और उसके साथ एक हज़ार वर्ष तक राज्य करेंगे।[७] फिर एक हज़ार वर्ष पूरे हो चुकाने पर शैतान को उसके बन्दीगृह से छोड़ दिया जाएगा।[८] और वह समूची धरती पर फैली जातियों को छलने के लिए निकल पड़ेगा। वह गोग और मागोग को छलेगा। वह उन्हें युद्ध के लिए एकत्र करेगा। वे उतने ही अनगिनत होंगे जितने समुद्र तट के रेत-कण।[९] शैतान की सेना समूची धरती पर फैल जायेगी और वे संत जनों के डेरे और प्रिय नगरी को घेर लेंगे। किन्तु आग उतरेगी और उन्हें निगल जाएगी।[१०] इस के पश्चात् उस शैतान को जो उन्हें छलता रहा है भभकती गंधक की झील में फेंक दिया जाएगा जहाँ वह पशु और झूठे नबी, दोनों ही डाले गए हैं। सदा सदा के लिए उन्हें रात दिन तड़पाया जाएगा।[११] फिर मैंने एक विशाल श्वेत सिंहासन के और उसे जो उस पर विराजमान था, देखा। उसके सामने से धरती और आकाश भाग खड़े हुए। उनका पता तक नहीं चल पाया।[१२] फिर मैंने छोटे और बड़े मृतकों को देखा। वे सिंहासन के आगे खड़े थे। कुछ पुस्तकें खोली गयी। फिर एक और पुस्तक खोली गयी। यही ‘जीवन की पुस्तक’ है। उन कर्मो के अनुसार जो पुस्तकों में लिखे गए थे, मृतकों का न्याय किया गया।[१३] जो मृतक सागर में थे, उन्हें सागर ने दे दिया, तथा मृत्यु और पाताल ने भी अपने अपने मृतक सौंप दिए। प्रत्येक का न्याय उसके कर्मो के अनुसार किया गया।[१४] इसके बाद मृत्यु को और पाताल को आग की झील में झोंक दिया गया। यह आग की झील ही दूसरी मृत्यु है।[१५] यदि किसी का नाम ‘जीवन की पुस्तक’ में लिखा नहीं मिला, तो उसे भी आग की झील में धकेल दिया गया।

Hindi ERV 2010
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