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Maithili Bible 2010

मत्ती 24

1
यीशु जखन मन्‍दिर सँ निकलि कऽ चल जा रहल छलाह तँ हुनकर शिष्‍य सभ हुनका लग आबि कऽ मन्‍दिरक मकान सभ देखाबऽ लगलथिन।
2
यीशु हुनका सभ केँ कहलथिन, “ई सभ चीज देखैत छी? हम अहाँ सभ केँ सत्‍य कहैत छी जे एतऽ एकोटा पाथर एक-दोसर पर नहि रहत। सभ ढाहल जायत।”
3
जैतून पहाड़ पर यीशु जखन बैसल छलाह तँ शिष्‍य सभ हुनका लग आबि कऽ एकान्‍त मे हुनका सँ पुछलथिन, “हमरा सभ केँ कहू जे ई घटना कहिया होयत? अहाँ आब फेर आबऽ पर छी आ संसारक अन्‍त होमऽ पर अछि, ताहि समय केँ हम सभ कोन बात सँ चिन्‍हब?”
4
यीशु हुनका सभ केँ उत्तर देलथिन, “होसियार रहू जे अहाँ सभ केँ केओ बहकाबऽ नहि पाबय।
5
बहुतो लोक हमर नाम लऽ कऽ आओत आ कहत जे, ‘हमहीं उद्धारकर्ता-मसीह छी,’ आ बहुतो लोक केँ बहका देत।
6
अहाँ सभ लड़ाइक समाचार आ लड़ाइक हल्‍ला सभ सुनब। मुदा देखू, ताहि सँ घबड़ायब नहि। ई सभ होयब आवश्‍यक अछि, मुदा संसारक अन्‍त तहियो नहि होयत।
7
एक देश दोसर देश सँ लड़ाइ करत, और एक राज्‍य दोसर राज्‍य सँ। बहुतो ठाम मे अकाल पड़त आ भूकम्‍‍प होयत।
8
ई सभ बात तँ कष्‍टक शुरुआते होयत।
9
“ओहि समय मे लोक सभ अहाँ सभ पर अत्‍याचार करयबाक लेल अहाँ सभ केँ अधिकारी सभक जिम्‍मा मे लगा देत आ मरबा देत। अहाँ सभ सँ सभ देशक लोक सभ एहि लेल घृणा करत जे अहाँ सभ हमर लोक छी।
10
ओहि समय मे बहुतो लोक अपन विश्‍वास छोड़ि देत। ओ सभ एक-दोसर केँ पकड़बाओत आ एक-दोसर सँ घृणा करत।
11
एहन बहुतो लोक सभ प्रगट भऽ जायत जे झूठ बाजि कऽ अपना केँ परमेश्‍वरक प्रवक्‍ता कहत आ बहुतो लोक केँ बहका देत।
12
अधर्मक वृद्धि भेला सँ अनेक लोकक आपसी प्रेम मन्‍द पड़ि जायत।
13
मुदा जे केओ अन्‍त धरि स्‍थिर रहत से उद्धार पाओत।
14
परमेश्‍वरक राज्‍यक ई शुभ समाचारक प्रचार सम्‍पूर्ण संसार मे कयल जायत जाहि सँ एकरा सम्‍बन्‍ध मे सभ जातिक लोक गवाही सुनय; तखन अन्‍तक समय आबि जायत।
15
“तेँ जखन अहाँ सभ ‘विनाश करऽ वला घृणित वस्‍तु’ केँ पवित्र स्‍थान मे ठाढ़ देखब, जकरा विषय मे परमेश्‍वरक प्रवक्‍ता दानिएल कहने छथि—पढ़ऽ वला ई बात ध्‍यान दऽ कऽ बुझू!—
16
तखन जे सभ यहूदिया प्रदेश मे होअय से सभ पहाड़ पर भागि जाय।
17
जे घरक छत पर होअय से उतरि कऽ घर मे सँ कोनो वस्‍तु लेबऽ नहि लागओ।
18
आ जे खेत मे होअय से घर मे सँ अपन ओढ़ना लेबाक लेल घूमि कऽ नहि आबओ।
19
ओहि समय मे जे स्‍त्रीगण सभ गर्भवती होयत वा जकरा दूधपीबा बच्‍चा होयतैक, तकरा सभ केँ कतेक कष्‍ट होयतैक!
20
प्रार्थना करू जे जाड़क समय वा विश्राम-दिन कऽ अहाँ सभ केँ भागऽ-पड़ाय नहि पड़य।
21
ओहि समय मे एहन कष्‍ट होयत जे सृष्‍टिक आरम्‍भ सँ आइ तक कहियो नहि भेल अछि आ ने फेर कहियो होयत।
22
जँ ओहि समय केँ घटा नहि देल जाइत तँ कोनो मनुष्‍य नहि बचैत, मुदा परमेश्‍वर अपन चुनल लोक सभक कारणेँ ओहि समय केँ घटा देताह।
23
“ओहि समय मे जँ केओ अहाँ सभ केँ कहत जे, ‘देखू, मसीह एतऽ छथि!’ वा ‘ओतऽ छथि!’ तँ ओहि बात पर विश्‍वास नहि करू।
24
कारण, ओहि समय मे झुट्ठा मसीह आ झूठ बाजि कऽ अपना केँ परमेश्‍वरक प्रवक्‍ता कहऽ वला सभ प्रगट होयत, और एहन अजगूत बात आ चमत्‍कार सभ देखाओत जे, जँ सम्‍भव रहैत, तँ परमेश्‍वरक चुनल लोक सभ केँ सेहो बहका दैत।
25
देखू, हम अहाँ सभ केँ पहिनहि कहि देलहुँ।
26
“तेँ जँ केओ अहाँ सभ केँ कहत जे, ‘चलू, देखू, ओ निर्जन स्‍थान मे छथि,’ तँ ओकरा संग बाहर नहि जाउ। अथवा जँ कहत जे, ‘देखू, ओ एतऽ कोठरी मे छथि,’ तँ विश्‍वास नहि करू।
27
किएक तँ जहिना बिजलोकाक चमक पूब सँ निकलि कऽ पश्‍चिम तक देखाइ दैत अछि, तहिना जखन मनुष्‍य-पुत्र फेर औताह तँ एहने होयत।
28
जतऽ कतौ लास रहैत अछि ततऽ गिद्ध सभ जुटैत अछि।
29
“ओहि समयक कष्‍टक ठीक बाद, ‘सूर्य अन्‍हार भऽ जायत, चन्‍द्रमा इजोत नहि देत, आकाश सँ तारा सभ खसत, और आकाशक शक्‍ति सभ हिलि जायत।’
30
तकरबाद मनुष्‍य-पुत्रक अयबाक चिन्‍ह आकाश मे देखाइ देत। पृथ्‍वी परक सभ जातिक लोक सभ कन्‍ना-रोहटि करत और मनुष्‍य-पुत्र केँ सामर्थ्‍य आ अपार महिमाक संग आकाशक मेघ मे अबैत देखत।
31
धुतहूक पैघ आवाजक संग ओ अपन स्‍वर्गदूत सभ केँ चारू दिस पठौताह आ ओ सभ आकाश आ पृथ्‍वीक अन्‍तिम सीमा तक जा कऽ हुनकर चुनल लोक सभ केँ जमा करताह।
32
“आब अंजीरक गाछ सँ एकटा बात सिखू। जखन ओकर ठाढ़ि कोमल होमऽ लगैत छैक आ ओहि मे नव पात निकलऽ लगैत छैक तँ अहाँ सभ बुझि जाइत छी जे गर्मीक समय आबि रहल अछि।
33
तहिना जखन अहाँ सभ ई सभ बात होइत देखब तँ बुझि लिअ जे समय लगचिआ गेल, हँ, ई बुझू जे ओ घरक मुँह पर आबि गेल अछि।
34
हम अहाँ सभ केँ सत्‍य कहैत छी जे एहि पीढ़ी केँ समाप्‍त होमऽ सँ पहिने ई सभ घटना निश्‍चित घटत।
35
आकाश और पृथ्‍वी समाप्‍त भऽ जायत, मुदा हमर वचन अनन्‍त काल तक रहत।
36
“मुदा एहि घटना सभक दिन वा समय केओ नहि जनैत अछि, स्‍वर्गदूतो सभ नहि आ पुत्रो नहि —मात्र पिता जनैत छथि।
37
जहिना नूहक समय मे भेल तहिना ओहि समय मे होयत जहिया मनुष्‍य-पुत्र फेर औताह।
38
जल-प्रलय होमऽ सँ पहिने लोक सभ खाय-पिबऽ मे आ विवाह करऽ-कराबऽ मे लागल छल। नूह जाहि दिन जहाज मे चढ़ि गेलाह ताहि दिन तक लोक सभ एहि सभ काज मे मस्‍त रहल।
39
ओकरा सभ केँ किछु बुझऽ मे नहि अयलैक जे कोन बात सभ होमऽ वला अछि, ताबत जल-प्रलयक बाढ़ि आबि कऽ ओकरा सभ केँ बहा कऽ लऽ गेलैक। मनुष्‍य-पुत्र जहिया फेर औताह, तहिया ओहिना होयत।
40
ओहि समय मे दू गोटे खेत मे रहत; ओहि मे सँ एकटा लऽ लेल जायत आ दोसर ओतहि छोड़ि देल जायत।
41
दूटा स्‍त्रीगण जाँत पिसैत रहत, एकटा लऽ लेल जायत आ दोसर छोड़ि देल जायत।
42
“तेँ अहाँ सभ चौकस रहू, कारण अहाँ सभ नहि जनैत छी जे अहाँ सभक प्रभु कोन दिन आबि जयताह।
43
मुदा ई बात ठीक सँ बुझि लिअ जे, जँ घरक मालिक केँ बुझल रहितैक जे चोर रातिक कोन पहर मे आओत तँ ओ जागल रहैत आ अपना घर मे सेन्‍ह नहि काटऽ दैत।
44
तेँ अहूँ सभ सदिखन तैयार रहू, कारण मनुष्‍य-पुत्र एहने समय मे आबि जयताह जाहि समयक लेल अहाँ सभ सोचबो नहि करब जे ओ एखन औताह।
45
“के अछि ओहन विश्‍वासपात्र आ बुद्धिमान सेवक जकरा मालिक अपन घरक आरो सेवक सभक मुखिया बनौथिन जे ओ ठीक सँ ओकरा सभक देख-रेख करैक आ समय पर भोजन-भातक व्‍यवस्‍था करैक?
46
ओहि सेवकक लेल कतेक नीक होयत, जकरा मालिक आबि कऽ ओहिना करैत पौताह।
47
हम अहाँ सभ केँ सत्‍य कहैत छी जे, मालिक अपन सम्‍पूर्ण सम्‍पत्तिक जबाबदेही ओकरा जिम्‍मा मे दऽ देथिन।
48
मुदा ओ सेवक जँ दुष्‍ट अछि आ एना सोचय जे, ‘हमर मालिक आबऽ मे बहुत देरी कऽ रहल अछि,’
49
आ ई सोचि ओ मालिकक आरो सेवक सभ केँ मारय-पिटय आ स्‍वयं पिअक्‍कड़ सभक संग खाय-पिबऽ लागय,
50
तँ ओहि सेवकक मालिक एहन दिन मे घूमि औताह जहिया ओ अपन मालिकक बाट नहि तकैत रहत आ एहन समय मे औताह जकरा ओ नहि जानत।
51
मालिक आबि कऽ ओकरा खण्‍ड-खण्‍ड कटबा देथिन आ ओकरा ताहि ठाम राखि देथिन जतऽ पाखण्‍डी लोक अपन दण्‍ड भोगैत अछि। ओतऽ लोक कनैत आ दाँत कटकटबैत रहैत अछि।
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