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BookNum: 42 Chapter: 11 VerseStart: 54 VerseShouldHave: 53
एक साल में बाइबल
अप्रैल 13

लूका 11:29-54
29. जखन यीशुक चारू कात लोकक भीड़ बढ़ि गेल तँ ओ ओकरा सभ केँ कहलथिन, “एहि पीढ़ीक लोक कतेक दुष्‍ट अछि! कारण, ई चमत्‍कार वला चिन्‍ह मँगैत अछि, मुदा जे घटना परमेश्‍वरक प्रवक्‍ता योनाक संग भेल छलनि, से चिन्‍ह छोड़ि कऽ एकरा सभ केँ आरो कोनो चिन्‍ह नहि देखाओल जयतैक।
30. जहिना योना निनवे नगरक निवासी सभक लेल चिन्‍ह बनलाह, तहिना मनुष्‍य-पुत्र एहि पीढ़ीक लेल चिन्‍ह रहत।
31. दक्षिण देशक रानी एहि पीढ़ीक लोकक संग न्‍यायक दिन मे ठाढ़ भऽ कऽ एकरा सभ केँ दोषी ठहरौतीह, किएक तँ ओ सुलेमान राजाक बुद्धिक बात सभ सुनबाक लेल पृथ्‍वीक दोसर कात सँ अयलीह, और हम अहाँ सभ केँ कहैत छी, एतऽ एखन केओ एहन अछि जे सुलेमानो सँ महान् अछि।
32. निनवेक निवासी सभ न्‍यायक दिन मे एहि पीढ़ीक लोकक संग ठाढ़ भऽ कऽ एकरा सभ केँ दोषी ठहराओत, किएक तँ ओ सभ योनाक प्रचार सुनि कऽ अपना पापक लेल पश्‍चात्ताप कऽ कऽ हृदय-परिवर्तन कयलक, और हम अहाँ सभ केँ कहैत छी, एतऽ एखन केओ एहन अछि जे योनो सँ महान् अछि।
33. “केओ डिबिया लेसि कऽ ओकरा नुका कऽ नहि रखैत अछि, आ ने पथिया सँ झँपैत अछि। ओ ओकरा लाबनि पर रखैत अछि, जाहि सँ भीतर आबऽ वला लोक सभ केँ इजोत भेटैक।
34. शरीरक डिबिया अहाँक आँखि भेल। जखन आँखि ठीक अछि तँ अहाँक सम्‍पूर्ण शरीर इजोत मे रहैत अछि, मुदा जखन अहाँक आँखि खराब अछि तँ सम्‍पूर्ण शरीर अन्‍हार मे अछि।
35. तेँ सावधान रहू जे कतौ अहाँक भितरी इजोत अन्‍हार नहि बनि जाय।
36. एहि लेल जँ अहाँक सौंसे शरीर इजोत मे अछि, कोनो अंग अन्‍हार मे नहि अछि, तँ ओ पूर्ण रूप सँ इजोत सँ चमकत, जहिना डिबिया अपना प्रकाश सँ अहाँ केँ आलोकित करैत अछि।”
37. यीशु जखन ई सभ बात कहब समाप्‍त कयलनि, तँ हुनका एक फरिसी भोजनक लेल निमन्‍त्रण देलथिन। यीशु हुनका ओहिठाम गेलाह आ भोजन करबाक लेल भीतर मे बैसलाह।
38. ई देखि जे यीशु भोजन करऽ सँ पहिने रीतिक अनुसार हाथ-पयर नहि धोलनि, फरिसी केँ बड्ड आश्‍चर्य लगलनि।
39. मुदा प्रभु हुनका कहलथिन, “अहाँ फरिसी सभ थारी-बाटी सभ केँ बाहर-बाहर तँ मँजैत छी, मुदा भीतर अहाँ सभ लोभ और दुष्‍टता सँ भरल छी।
40. है मूर्ख सभ! जे बाहरक भाग बनौलनि, की से भीतरको भाग नहि बनौलनि?
41. अहाँ सभक बाटी मे जे किछु अछि से गरीब सभ केँ दान करिऔक, तखन अहाँ सभक लेल सभ किछु शुद्ध होयत।
42. “यौ फरिसी सभ, धिक्‍कार अछि अहाँ सभ केँ! कारण, अहाँ सभ पुदीना, मसल्‍ला और छोट सँ छोट साग-पात सभक दसम अंश तँ परमेश्‍वर केँ अर्पण करैत छी, मुदा न्‍याय और परमेश्‍वरक प्रेम सँ कोनो मतलब नहि रखैत छी। होयबाक तँ ई चाहैत छल जे ओ सभ बात करैत परमेश्‍वरक प्रेम और न्‍याय पर ध्‍यान दितहुँ।
43. “यौ फरिसी सभ, धिक्‍कार अछि अहाँ सभ केँ! कारण, सभाघर सभ मे प्रमुख आसन पर बैसब और हाट-बजार मे लोकक प्रणाम स्‍वीकार करब अहाँ सभ केँ बहुत नीक लगैत अछि।
44. “हँ, धिक्‍कार अछि अहाँ सभ केँ! कारण, अहाँ बिनु चिन्‍हक कबर सनक छी जाहि पर लोक बिनु बुझने चलैत-फिरैत अछि।”
45. एहि पर धर्म-नियमक एक पंडित यीशु केँ उत्तर देलथिन, “गुरुजी, एहन बात सभ कहि कऽ अहाँ हमरो सभक अपमान करैत छी।”
46. यीशु कहलथिन, “हँ, अहूँ सभ जे धर्म-नियमक पंडित छी, धिक्‍कार अछि अहाँ सभ केँ! अहाँ सभ लोक सभ पर तेहन बोझ लादि दैत छिऐक जे ओ सभ सहि नहि सकैत अछि और ओकरा सभ केँ बोझ उठाबऽ मे आङुरो भिड़ा कऽ मदति नहि करैत छिऐक।
47. “धिक्‍कार अछि अहाँ सभ केँ! कारण, अहाँ सभ परमेश्‍वरक ओहि प्रवक्‍ता सभक कबर पर चबुतराक निर्माण करैत छी जिनका अहाँ सभक पूर्वज सभ जान सँ मारि देलकनि।
48. एहि तरहेँ अहाँ सभ स्‍पष्‍ट करैत छी जे अपना पूर्वज सभक काज सँ सहमत छी। ओ सभ हुनका सभ केँ मारि देलकनि और अहाँ सभ हुनकर सभक कबर बनबैत छी।
49. एहि कारणेँ सर्वज्ञानी परमेश्‍वर कहलनि, ‘हम ओकरा सभक ओहिठाम अपन प्रवक्‍ता और दूत लोकनि केँ पठयबैक। ओ सभ हिनका सभ मे सँ कतेको गोटे केँ मारि देतनि और कतेको गोटे केँ सतौतनि।’
50. तेँ सृष्‍टिक आरम्‍भ सँ परमेश्‍वरक जतेक प्रवक्‍ताक खून बहाओल गेल अछि तकर लेखा एहि पीढ़ीक लोक सँ लेल जायत,
51. अर्थात् हाबिलक खून सँ लऽ कऽ, मन्‍दिरक बलि-वेदी और ‘पवित्र स्‍थान’क बीच मे मारल गेल जकरयाहक खून धरिक लेखा। हम अहाँ सभ केँ कहैत छी जे तकर पूरा लेखा एही पीढ़ीक लोक सँ लेल जायत।
52. “यौ धर्म-नियमक पंडित सभ, धिक्‍कार अछि अहाँ सभ केँ! कारण, अहाँ सभ ओ कुंजी छिनि कऽ रखने छी जे ज्ञानक द्वारि खोलैत अछि। अहाँ सभ अपनो नहि प्रवेश कयलहुँ, और जे सभ प्रवेश कऽ रहल छल तकरो सभ केँ रोकि देलिऐक।”
53. जखन यीशु ओहिठाम सँ चल गेलाह तँ फरिसी और धर्मशिक्षक सभ हुनकर कड़ा विरोध करऽ लागल। ओ सभ एहि बातक घात लगा कऽ हुनका सँ विभिन्‍न विषय मे प्रश्‍न करऽ लगलनि जे हुनकर कोनो कहल बात द्वारा हुनका फँसाबी।