एक साल में बाइबल
दिसंबर 18


दानिय्येल 5:1-30
1. राजा बेलशस्सर ने अपने एक हजार अधिकारियों को एक बड़ी दावत दी। राजा उनके साथ दाखमधु पी रहा था।
2. राजा बेलशस्सर ने दाखमधु पीते हुए अपने सेवकों को सोने और चाँदी के प्याले लाने को कहा। ये वे प्याले थे जिन्हें उसके दादा नबूकदनेस्सर ने यरूशलेम के मन्दिर से लिया था। राजा बेलशस्सर चाहता था कि उसके शाही लोग, उसकी पत्नियाँ, तथा उसकी दासियाँ इन प्यालों से दाखमधु पियें।
3. सो सोने के वे प्याले लाये गये जिन्हें यरूशलेम में परमेश्वर के मन्दिर से उठाया गया था। फिर राजा ने और उसके अधिकारियों ने, उसकी रानियों ने तथा उसकी दासियों ने, उन प्यालों से दाखमधु पिया।
4. दाखमधु पीते हुए वे अपने देवताओं की मूर्तियों की स्तुति कर रहे थे। उन्होंने उन देवताओं की स्तुति की जो देवता सोने,चाँदी, काँसे,लोहे,लकड़ी और पत्थर के मूर्ति मात्र थे।
5. उसी समय अचानक किसी पुरूष का एक हाथ प्रकट हुआ और दीवार पर लिखने लगा। उसकी उंगलियाँ दीवार के लेप को कुरेदती हुई शब्द लिखने लगीं। दीवार के पास राजा के महल में उस हाथ ने दीवार पर लिखा। हाथ जब लिख रहा था तो राजा उसे देख रहा था।
6. राजा बेलशस्सर बहुत भयभीत हो उठा। डर से उसका मुख पीला पड़ गया और उसके घुटने इस प्रकार काँपने लगे कि वे आपस में टकरा रहे थे। उसके पैर इतने बलहीन हो गये कि वह खड़ा भी नहीं रह पा रहा था।
7. राजा ने तांत्रिकों और कसदियों को अपने पास बुलवाया और उनसे कहा, “मुझे जो कोई भी इस लिखावट को पढ़कर बताएगा और मुझे उसका अर्थ समझा देगा,मैं उसे पुरस्कार दूँगा। उस व्यक्ति को मैं बैंगनी पोशाक भेंट करूँगा। मैं उसके गले में सोने का हार पहनाऊँगा और मैं उसे अपने राज्य का तीसरा सबसे बड़ा शासक बना दूँगा।”
8. सो राजा के सभी बूद्धिमान पुरूष वहा आ गये किन्तु वे उस लिखावट को नहीं पढ़ सके। वे समझ ही नहीं सके कि उसका क्या अर्थ है।
9. राजा बेलशस्सर के हाकिम चक्कर में पड़े हुए थे और राजा तो और भी अधिक भयभीत और चिंतित था। उसका मुख डर से पीला पड़ा हुआ था।
10. तभी जहाँ वह दावत चल रही थी, वहाँ राजा की माँ आई।उसने राजा और उसके राजकीय अधिकारीयों की आवाज़े सुन लीं थी, उसने कहा, “हे राजा, चिरंजीव रह! डर मत! तु अपने मुहँ को डर से इतना पीला मत पड़ने दे!
11. देख, तेरे राज्य में एक ऐसा व्यक्ति है जिसमें पवित्र ईश्वरों की आत्मा बसती है। तेरे पिता के दिनों में इस व्यक्ति ने यह दर्शाया था कि वह रहस्यों को समझ सकता है। उसने यह दिखा दिया था कि वह बहुत चुस्त और बुद्धिमान है। उसने यह प्रकट कर दिया था कि इन बातों में वह ईश्वर के समान है। तेरे दादा राजा नबूकदनेस्सर ने इस व्यक्ति को सभी बुद्धिमान पुरूषों पर मुखिया नियुक्त किया था। वह सभी तांत्रिकों और कसदियों पर हुकूमत करता था।
12. मैं जिस व्यक्ति के बारे में बातें कर रही हूँ उसका नाम दानिय्येल है। किन्तु राजा ने उसे बेलतशस्सर का नाम दे दिया था। बेलतशस्सर (दानिय्येल) बहुत चुस्त है और वह बहुत सी बाते जानता है। वह स्वप्नों की व्याख्या कर सकता है। पहेलियों को समझा सकता है और कठिन से कठिन हलों को सुलझा सकता है। तू दानिय्येल को बुला। दीवार पर जो लिखा है, उसका अर्थ तुझे वही बतायेगा।”
13. सो वह दानिय्येल को राजा के पास ले आये। राजा ने दानिय्येल से कहा,”क्या तेरा नाम दानिय्येल है मेरे पिता महाराज यहूदा से जिन लोगों को बन्दी बनाकर लाये थे, क्या तू उन्ही में से एक है
14. मैंने सुना है, कि ईश्वरों की आत्मा का तुझमें निवास है और मैंने यह भी सुना है कि तू रहस्यों को समझता है, तू बहुत चुस्त और बुद्धिमान है।
15. बुद्धिमान पुरूष और तांत्रिकों को इस दीवार की लिखावट को समझाने के लिए मेरे पास लाया गया। मैं चाहता था कि वे लोग उस लिखावट का अर्थ बतायें। किन्तु दीवार पर लिखी इस लिखावट की व्याख्या वे मुझे नहीं दे पाए।
16. मैंने तेरे बारे में सुना है कि तू बातों के अर्थ की व्याख्या कर सकता है और तू अत्यंत कठिन समस्याओं के उत्तर भी ढ़ँूढ सकता है। यदि दीवार की इस लिखावट को तू पढ़ दे और इसका अर्थ तू मुझे समझा दे तो मैं तुझे यहे वस्तुएँ दूँगा। मैं तुझे बैंगनी रंग की पोशाक प्रदान करूँगा, तेरे गले में सोने का हार पहनाऊँगा। फिर तो तू इस राज्य का तीसरा सबसे बड़ा शासक बन जायेगा।”
17. इसके बाद दानिय्येल ने राजा को उत्तर देते हुए कहा, “हे राजा बेलशस्सर, तुम अपने उपहार अपने पास रखो, अथवा चाहो तो उन्हें किसी और को दे दो। मैं तुम्हें वैसे ही दीवार की लिखावट पढ़ दूँगा और उसका अर्थ क्या है, यह तुम्हें समझा दूँगा।
18. “हे राजन, परम प्रधान परमेश्वर ने तुम्हारे दादा नबूकदनेस्सर को एक महान शक्तिशाली राजा बनाया था। परमेश्वर ने उन्हें अत्याधिक महत्वपूर्ण बनाया था।
19. बहुत से देशों के लोग और विभिन्न भाषाएँ बोलनेवाले नबूकदनेस्सर से डरा करते थे क्योंकि परम प्रधान परमेश्वर ने उसे एक बहुत बड़ा राजा बनाया था। यदि नबूकदनेस्सर किसी को मार डालना चाहता तो वह मार दिया जाता और यदि वह चाहता कि कोई व्यक्ति जीवित रहे तो उसे जीवित रहने दिया जाता। यदि वह लोगों को बड़ा बनाना चाहता तो वह उन्हें बड़ा बना देता और यदि वह चाहता कि उन्हें महत्वहीन कर दिया जाये तो वह उन्हें महत्वहीन कर देता।
20. किन्तु नबूकदनेस्सर को अभिमान हो गया और वह हठीला बन गया। सो परमेश्वर द्वारा उससे उसकी शक्ति छींन ली गयी। उसे उसके राज सिंहासन से उतार फेंका गया और उसे महिमा विहीन बना दिया गया।
21. इसके बाद लोगों से दूर भाग जाने के लिये नबूकदनेस्सर को विवश किया गया। उसकी बुद्धि किसी पशु जैसी हो गयी। वह जंगली गधों के बीच में रहने लगा और ढोरों की तरह घास खाता रहा। वह ओस में भीगा। जब तक उसे सबक नहीं मिल गया, उसके साथ ऐसा ही होता गया। फिर उसे यह ज्ञान हो गया कि मनुष्य के राज्य पर परम प्रधान परमेश्वर का ही शासन है और साम्राज्यों के ऊपर शासन करने के लिये वह जिस किसी को भी चाहता है,भेज देता है।
22. “किन्तु हे बेलशस्सर,तुम तो इन बातों को जानते ही हो! तुम नबूकदनेशस्सर के पोते हो किन्तु फिर भी तुमने अपने आपको विनम्र नहीं बनाया।
23. नहीं! तुम विनम्र तो नहीं हुए और उलटे स्वर्ग के यहोवा के विरूद्ध हो गये। तुमने यहोवा के मन्दिर के पात्रों को अपने पास लाने की आज्ञा दी और फिर तुमने, तुम्हारे शाही हाकिमों ने, तुम्हारी पत्नियों ने, तुम्हारी दासियों ने उन पात्रों में दाखमधु पीया। तुमने चाँदी, सोने, काँसे, लोहे, लकड़ी और पत्थर के देवताओं के गुण गाये। वे सचमुच के देवता नहीं हैं। वे देख नहीं सकते, सुन नहीं सकते तथा वे कुछ समझ भी नहीं सकते हैं। तुमने उस परमेश्वर को आदर नही दिया, जिसका तुम्हारे जीवन या जो कुछ भी तुम करते हो, उस पर अधिकार है।
24. सो इसलिए, परमेश्वर ने उस हाथ को भेजा जिसने दीवार पर लिखा।
25. दीवार पर जो शब्द लिखे गये हैं, वे ये हैं: “मने, मने तकेल, ऊपर्सीना।”
26. “इन शब्दों का अर्थ यह है, “मने” अर्थात् जब तेरे राज्य का अंत होगा, परमेश्वर ने तब तक के दिन गिन लिये हैं।
27. “तकेल”: अर्थात् तराजू पर तुझे तोल लिया गया है और तू पूरा नहीं उतरा है।
28. “ऊपर्सीन”: अर्थात् तुझसे तेरा राज्य छीना जा रहा है और उसका बंटवारा हो रहा है। यह राज्य मादियों और फारसियों के लोगों को दे दिया जायेगा।”
29. इसके बाद बेलशस्सर ने आज्ञा दी कि दानिय्येल को बैंगनी वेशभूषा पहनायी जाये।उसके गले में सोने का हार पहना दिया जाये और यह घोषणा कर दी गयी कि वह राज्य का तीसरा सबसे बड़ा शासक होगा।
30. उसी रात बाबुल की प्रजा के स्वामी राजा बेलशस्सर का वध कर दिया गया।

दानिय्येल 6:1-28
1. दारा के मन में विचार आया कि कितना अच्छा रहे यदि एक सौ बीस प्रांत-अधिपतियों के द्वारा समूचे राज्य की हुकूमत को चलाया जाये
2. और इसके लिये उसने उन एक सौ बीस प्रांत-अधिपतियों के ऊपर शासन करने के लिये तीन व्यक्तियों को अधिकारी नि़युक्त कर दिया। इन तीनों देख-रेख करने वालों में एक था दानिय्येल। इन तीन व्यक्तियों की नियुक्ति राजा ने इसलिये की थी कि कोई उसके साथ छल न कर पाये और उसके राज्य की कोई भी हानि न हो।
3. दानिय्येल ने यह कर दिखाया कि वह दूसरे पर्यवेक्षकों से अधिक उत्तम है। दानिय्येल ने यह काम अपने अच्छे चरित्र और बड़ी योग्यताओं के द्वारा सम्पन्न किया। राजा दानिय्येल से इतना अधिक प्रभावित हुआ कि उसने दानिय्येल को सारी हुकूमत का हाकिम बनाने की सोची।
4. किन्तु जब दूसरे पर्यवेक्षकों और प्रांत-अधिपतियों ने इसके बारे में सुना तो उन्हें दानिय्येल से ईर्ष्या होने लगी। वे दानिय्येल को कोसने के लिये कारण ढूँढने का जतन करने लगे। सो जब दानिय्येल सरकारी कामकाज से कहीं बाहर जाता तो वे उसके द्वारा किये गये कामों पर नज़र रखने लगे। किन्तु फिर भी वे दानिय्येल में कोई दोष नहीं ढूँढ़ पाये।सो वे उस पर कोई गलत काम करने का दोष नहीं लगा सके। दानिय्येल बहुत ईमानदार और भरोसेमंद व्यक्ति था। उसने राजा के साथ कभी कोई छल नहीं किया।वह कठिन परिश्रमी था।
5. आखिरकार उन लोगों ने कहा, “दानिय्येल पर कोई बुरा काम करने का दोष लगाने की कोई वजह हम कभी नहीं ढूँढ़ पायेंगे। इसलिये हमें शिकायत के लिये कोई ऐसी बात ढूँढ़नी चाहिये जो उसके परमेश्वर के नियमों से सम्बंध रखती हो।”
6. सो वे दोनों पर्यवेक्षक और वे प्रांत-अधिपति टोली बना कर राजा के पास गये। उन्होंने कहा, “हे राजा दारा, तुम अमर रहो!
7. हम सभी पर्यवेक्षक, हाकिम, प्रांत-अधिपति, मंत्री और राज्यपाल किसी एक बात पर सहमत हैं। हमारा विचार है कि राजा को यह नियम बना देना चाहिये और हर व्यक्ति को इस नियम का पालन करना चाहिये। वह नियम यह हैं, “यदि अगले तीस दिनों तक कोई भी व्यक्ति हे राजा, आपको छोड़ किसी और देवता या व्यक्ति की प्रार्थना करे तो उस व्यक्ति को शेरों की माँद में डाल दिया जाये।
8. अब हे राजा! जिस कागज पर यह नियम लिखा है, तुम उस पर हस्ताक्षर कर दो। इस तरह से यह नियम कभी बदला नहीं जा सकेगा। क्योंकि मीदियों और फ़ारसियों के नियम न तो बदले जा सकते हैं और न ही मिटाए जा सकते हैं।”
9. सो राजा दारा ने यह नियम बना कर उस पर हस्ताक्षर कर दिये।
10. दानिय्येल तो सदा ही प्रतिदिन तीन बार परमेश्वर से प्रार्थना किया करता था। हर दिन तीन बार दानिय्येल अपने घुटनों के बल झुक कर अपने परमेश्वर की प्रार्थना करता और उसका गुणगान करता था। दानिय्येल ने जब इस नये नियम के बारे में सुना तो वह अपने घर चला गया । दानिय्येल अपने मकान की छत के ऊपर, अपने कमरे में चला गया। दानिय्येल उन खिड़कियों के पास गया जो यरूशलम की ओर खुलती थीं। फिर वह अपने घटनों के बल झुका जैसे सदा किया करता था, उसने वैसे ही प्रार्थना की।
11. फिर वे लोग झुण्ड बना कर दानिय्येल के यहाँ जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने दानिय्येल को प्रार्थना करते और परमेश्वर से दया माँगते पाया।
12. बस फिर क्या था। वे लोग राजा के पास जा पहुँचे और उन्होंने राजा से उस नियम के बारे में बात की जो उसने बनाया था। उन्होंने कहा, “हे राजा दारा , आपने एक नियम बनाया है। जिसके अनुसार अगले तीस दिनों तक यदि कोई व्यक्ति किसी देवता से अथवा तेरे अतिरिक्त किसी व्यक्ति से प्रार्थना करता है तो, राजन, उसे शेरों की माँद में फेंकवा दिया जायेगा। बताइये क्या आपने इस नियम पर हस्ताक्षर नहीं किये थे” राजा ने उत्तर दिया, “हाँ,’ मैंने उस नियम पर हस्ताक्षर किये थे और मादियों और फारसियों के नियम अटल होते हैं। न तो वे बदले जा सकते हैं, और न ही मिटाये जा सकते हैं।”
13. इस पर उन लोगों ने राजा से कहा, “दानिय्येल नाम का वह व्यक्ति आपकी बात पर ध्यान नहीं दे रहा है। दानिय्येल यहूदा के बन्दियों में से एक हैं। जिस नियम पर आपने हस्ताक्षर किये हैं , दानिय्येल उस पर ध्यान नहीं दे रहा है। दानिय्येल अभी भी हर दिन तीन बार अपने परमेश्वर की प्रार्थना करता है।”
14. राजा ने जब सुना तो बहुत दु:खी और व्याकुल हो उठा। राजा ने दानिय्येल को बचाने की ठान ली। दानिय्येल को बचाने की कोई उपाय सोचते सोचते उसे शाम हो गयी।
15. इसके बाद वे लोग झुण्ड बना कर राजा के पास पहुँचे। उन्होंने राजा से कहा, “हे राजन, मादियों और फ़ारसियों की व्यवस्था के अनुसार जिस नियम अथवा आदेश पर राजा हस्ताक्षर कर दे, वह न तो कभी बदला जा सकता है और न ही कभी मिटाया जा सकता है।”
16. सो राजा दारा ने आदेश दे दिया। वे लोग दानिय्येल को पकड़ लाये और उसे शेरों की मांद में फेंक दिया। राजा ने दानिय्येल से कहा, “मुझे आशा है कि तू जिस परमेश्वर की सदा उपासना करता है, वह तेरी रक्षा करेगा।”
17. एक बड़ा सा पत्थर लाया गया और उसे शेरों की मांद के द्वार पर अड़ा दिया गया। फिर राजा ने अपनी अंगूठी ली और उस पत्थर पर अपनी मुहर लगा दी। साथ ही उसने अपने हाकिमों की अंगूठियों की मुहरें भी उस पत्थर पर लगा दीं। इसका यह अभिप्राय था कि उस पत्थर को कोई भी हटा नहीं सकता था और शेरों की उस माँद से दानिय्येल को बाहर नहीं ला सकता था।
18. इसके बाद राजा दारा अपने महल को वापस चला गया। उस रात उसने खाना नहीं खाया। वह नहीं चाहता था कि कोई उसके पास आये और उसका मन बहलाये। राजा सारी रात सो नहीं पाया।
19. अगली सुबह जैसे ही सूरज का प्रकाश फैलने लगा, राजा दारा जाग गया और शेरों की माँद की ओर दौड़ा।
20. राजा बहुत चिंतित था। राजा जब शेरों की मांद के पास गया तो वहाँ उसने दानिय्येवल को ज़ोर से आवाज़ लगाई। राजा ने कहा, “हे दानिय्येल, हे जीवित परमेश्वर के सेवक, क्या तेरा परमेश्वर तुझे शेरों से बचा पाने में समर्थ हो सका है तू तो सदा ही अपने परमेश्वर की सेवा करता रहा है।”
21. दानिय्येल ने उत्तर दिया, “राजा, अमर रहे!
22. मेरे परमेश्वर ने मुझे बचाने के लिये अपना स्वर्गदुत भेजा था। उस स्वर्गदूत ने शेरों के मुँह बन्द कर दिये। शेरों ने मुझे कोई हानि नही पहुँचाई क्योंकि मेरा परमेश्वर जानता है कि मैं निरपराध हूँ। मैंने राजा के प्रति कभी कोई बुरा नही किया है।”
23. राजा दारा बहुत प्रसन्न था। राजा ने अपने सेवकों को आदेश दिया कि वे दानिय्येल को शेरों की माँद से बाहर खींच लें। जब दानिय्येल को शेरों की माँद से बाहर लाया गया तो उन्हें उस पर कहीं कोई घाव नहीं दिखाई दिया। शेरों ने दानिय्येल को कोई हानि नहीं पहुँचाई थी क्योंकि दानिय्येल को अपने परमेश्वर पर विश्वास था।
24. इसके बाद राजा ने उन लोगों को जिन्होंने दानिय्येल पर अभियोग लगा कर उसे शेरों की माँद में डलवाया था, बुलवाने का आदेश दिया और उन लोगों को, उनकी पत्नियों को और उनके बच्चों को शेरों की माँद में फेंकवा दिया गया। इससे पहले कि वे शेरों की मांद में धरती पर गिरते, शेरों ने उन्हें दबोच लिया। शेर उनके शरीरों को खा गये और फिर उनकी हड्डियों को भी चबा गये।
25. इस पर राजा दारा ने सारी धरती के लोगों, दूसरी जाति के विभिन्न भाषा बोलनेवालों को यह पत्र लिखा: शुभकामनाएँ।
26. मैं एक नया नियम बना रहा हूँ। मेरे राज्य के हर भाग के लोगों के लिये यह नियम होगा। तुम सभी लोगों को दानिय्येल के परमेश्वर का भय मानना चाहिये और उसका आदर करना चाहिये। दानिय्येल का परमेश्वर जीवित परमेश्वर है। परमेश्वर सदा-सदा अमर रहता है! साम्राज्य उसका कभी समाप्त नहीं होगा उसके शासन का अन्त कभी नहीं होगा
27. परमेश्वर लोगों को बचाता है और रक्षा करता है। स्वर्ग में और धरती के ऊपर परमेश्वर अद्भुत आश्चर्यपूर्ण कर्म करता है! परमेश्वर ने दानिय्येल को शेरों से बचा लिया।”
28. इस तरह जब दारा का राजा था और जिन दिनों फारसी राजा कुस्रू की हूकुमत थी, दानिय्येल ने सफलता प्राप्त की।

भजन संहिता 136:10-26
10. परमेश्वर ने मिस्र में मनुष्यों और पशुओं के पहलौठों को मारा। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
11. परमेश्वर इस्राएल को मिस्र से बाहर ले आया। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
12. परमेश्वर ने अपना सामर्थ्य और अपनी महाशक्ति को प्रकटाया। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
13. परमेश्वर ने लाल सागर को दो भागों में फाड़ा। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
14. परमेश्वर ने इस्राएल को सागर के बीच से पार उतारा। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
15. परमेश्वर ने फ़िरौन और उसकी सेना को लाल सागर में डूबा दिया। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
16. परमेश्वर ने अपने निज भक्तों को मरुस्थल में राह दिखाई। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
17. परमेश्वर ने बलशाली राजा हराए। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
18. परमेश्वर ने सुदृढ़ राजाओं को मारा। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
19. परमेश्वर ने एमोरियों के राजा सीहोन को मारा। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
20. परमेश्वर ने बाशान के राजा ओग को मारा। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
21. परमेश्वर ने इस्राएल को उसकी धरती दे दी। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
22. परमेश्वर ने उस धरती को इस्राएल को उपहार के रूप में दिया। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
23. परमेश्वर ने हमको याद रखा, जब हम पराजित थे। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
24. परमेश्वर ने हमको हमारे शत्रुओं से बचाया था। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
25. परमेश्वर हर एक को खाने को देता है। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।
26. स्वर्ग के परमेश्वर का गुण गाओ। उसका सच्चा प्रेम सदा ही बना रहता है।

नीतिवचन 29:12-13
12. यदि एक शासक झूठी बातों को महत्व देता है तो उसके अधिकारी सब भ्रष्ट हो जाते हैं।
13. एक हिसाब से गरीब और जो व्यक्ति को लूटता है, वह समान है। यहोवा ने ही दोनों को बनाया है।

2 पतरस 2:1-22
1. जैसा भी रहा हो उन संत जनों के बीच जैसे झूठे नबी दिखाई पड़ने लगे थे बिलकुल वैसे ही झूठे नबी तुम्हारे बीच भी प्रकट होंगे। वे घातक धारणाओं का सूत्र-पात करेंगे और उस स्वामी तक को नकार देंगे जिसने उन्हें स्वतन्त्रता दिलायी। ऐसा करके वे अपने शीघ्र विनाश को निमन्त्रण देंगे।
2. बहुत से लोग उनकी भोग-विलास की प्रवृत्तियों का अनुसरण करेंगे। उनके कारण सच्चाई का मार्ग बदनाम होगा।
3. लोभ के कारण अपनी बनावटी बातों से वे तुमसे धन कमाएँगे। उनका दण्ड परमेश्वर के द्वारा बहुत पहले से निर्धारित किया जा चुका है। उनका विनाश तैयार है और उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।
4. क्योंकि परमेश्वर ने पाप करने वाले दूतों तक को जब नहीं छोड़ा और उन्हें पाताल लोक की अन्धेरे से भरी कोठरियों में डाल दिया कि वे न्याय के दिन तक वहीं पड़े रहें।
5. उसने उस पुरातन संसार को भी नहीं छोड़ा किन्तु नूह की उस समय रक्षा की जब अधर्मियों के संसार पर जल-प्रलय भेजी गयी थी। नूह उन आठ व्यक्तियों में से एक था जो जल प्रलय से बचे थे। धार्मिकता का प्रचारक नूह उपदेश दिया करता था।
6. सदोम और अमोरा जैसे नगरों को विनाश का दण्ड देकर राख बना डाला गया ताकि अधर्मी लोगों के साथ जो बातें घटेंगी, उनके लिए यह एक चेतावनी ठहरे।
7. उसने लूत को बचा लिया जो एक नेक पुरुष था। वह उद्दण्ड लोगों के अनैतिक आचरण से दुःखी रहा करता था।
8. वह धर्मी पुरुष उनके बीच रहते हुए दिन-प्रतिदिन जैसा देखता था और सुनता था, उससे उनके व्यवस्था रहित कर्मो के कारण, उसकी सच्ची आत्मा तड़पती रहती थी।
9. इस प्रकार प्रभु जानता है कि भक्तों को न्याय के दिन तक कैसे बचाया जाता है और दुष्टों को दण्ड के लिए कैसे रखा जाता है।
10. विशेषकर उनको जो अपनी पापपूर्ण प्रकृति की बुरी वासनाओं के पीछे चलते हैं और प्रभु की प्रभुता से घृणा रखते हैं। ये उद्दण्ड और स्वेच्छाचारी हैं। ये महिमावान स्वर्गदूतों का अपमान करने से भी नहीं डरते।
11. जबकि ये स्वर्गदूत जो शक्ति और सामर्थ्य में इन लोगों से बड़े हैं, प्रभु के सामने उन पर कोई निन्दापूर्ण दोष नहीं लगाते।
12. किन्तु ये लोग तो विचारहीन पशुओं के समान हैं जो अपनी सहजवृत्ति के अनुसार काम करते हैं। जिनका जन्म ही इसलिए होता है कि वे पकड़े जायें और मार डाले जायें। वे उन विषयों के विरोध में बोलते है, जिनके बारे में वे अबोध हैं। जैसे पशु मार डाले जाते हैं, वैसे ही इन्हें भी नष्ट कर दिया जायेगा।
13. इन्हें बुराई का बदला बुराई से मिलेगा। दिन के प्रकाश में भोग-विलास करना इन्हें भाता है। ये लज्जापूर्ण धब्बे हैं। ये लोग जब तुम्हारे साथ उत्सवों में सम्मिलित होते हैं तो
14. ये सदा किसी ऐसी स्त्री की ताक में रहते हैं जिसके साथ व्यभिचार किया जा सके। इस प्रकार इनकी आँखें पाप करने से बाज़ नहीं आतीं। ये अस्थिर लोगों को पाप के लिए फुसला लेते हैं। इनके मन पूरी तरह लालच के आदी हैं। ये अभिशाप के पुत्र हैं।
15. सीधा-सादा मार्ग छोड़कर ये भटक गये हैं। बओर के बेटे बिलाम के मार्ग पर ये लोग अग्रसर हैं; बिलाम, जिसे बंदी की मज़दूरी प्यारी थी।
16. किन्तु उसके बुरे कामों के लिए एक गदही, जो बोल नहीं पाती, मनुष्य की वाणी में बोली और उसे डाँटा फटकारा तथा उस नबी के उन्मादपूर्ण काम को रोका।
17. ये झूठे उपदेशक सूखे जल स्रोत हैं तथा ऐसे जल रहित बादल हैं जिन्हें तूफान उड़ा ले जाता है। इनके लिए सघन अन्धकारपूर्ण स्थान निश्चित किया गया है।
18. ये उन्हें जो भटके हुओं से बच निकलने का अभी आरम्भ ही कर रहे हैं, अपनी व्यर्थ की अहंकारपूर्ण बातों से उनकी भौतिक वासनापूर्ण इच्छाओं को जगा कर सत् पथ से डिगा लेते हैं।
19. ये झूठे उपदेशक उन्हें छुटकारे का वचन देते हैं। क्योंकि कोई व्यक्ति जो उसे जीत लेता है, वह उसी का दास हो जाता है।
20. सो यदि ये हमारे प्रभु एवम् उद्धारकर्त्ता यीशु मसीह को जान लेने और संसार के खोट से बच निकलने के बाद भी फिर से उन ही में फंस कर जगत की दुष्ट से हार गये हैं, तो उनके लिए उनकी यह बाद की स्थिति, उनकी पहली स्थिति से कहीं बुरी है
21. क्योंकि उनके लिए यही अच्छा था कि वे इस धार्मिकता के मार्ग को जान ही नहीं पाते बजाय इसके कि जो पवित्र आज्ञा उन्हें दी गयी थी, उसे जानकर उससे मुँह फेर लेते।
22. उनके साथ तो वैसे ही घटी जैसे कि उन सच्ची कहावतों में कहा गया है: “कुत्ता अपनी उल्टी के पास ही लौटता है।” और “एक नहलायी हुई सुअरनी कीचड़ में लोट लगाने के लिए फिर लौट जाती है।”